सोचती
हूँ लोग मंदिर क्यों जाते हैं ?
शांति पाने के लिए या भगवान कहीं रूठ न जाएँ कि मुझे उनकी याद ही नहीं आती
या फिर
जो नहीं है उसे मांगने के लिए ? ऐसे और भी कई सवाल मन में उठ रह हैं. अगर
उन्हें
लिखने लगूं तो जो लिखना चाह रही हूँ उससे विषयांतर हो जायेगा. खैर, इन सब
विचारों
के जड़ में है वो ५-६ साल का बच्चा. अपने माँ-बाप के साथ मंदिर आया था. वो
अपनी माँ और पिता की उंगली पकडे अन्दर आया. दोनों उसे लेकर भगवान के सामने
खड़े हो सर झुका हाथ जोड़कर प्रार्थना में लगे और वो बच्चा मौका देख
चुपके से खिसक लिया. और लगा मंदिर के अन्दर बीच के खाली जगह में दौड़-दौड़ के चक्कर लगाने.
मंदिर में कोई हाथ
में छोटी हनुमान चालीसा लिए पाठ कर रहा था. कुछ आपस में बातें कर रहे थे. कोई
आँखें बंद कर कुछ बुदबुदाते हुए किसी मन्त्र का जाप कर रहा था. तभी चटाक की आवाज़ ने सबका ध्यान
अपनी और खिंच लिया. बच्चा, जो अब तक अपनी दोनों बाहें फैलाये फुर-फुर कर मोटर दौड़ा
रहा था, अब अपनी बायीं गाल सहला रहा था और उसकी आँखों में आंसू भर गए. माँ ने घसीट
कर उसे भगवान की मूर्ति के आगे खड़ा कर दिया. हाथ जोड़वाया. पुजारी से उसके माथे पर
टीका लगवाया. उसके हाथ में प्रसाद दिलवाया. फिर छोड़ दिया. अब बच्चे के एक हाथ में
प्रसाद था और दुसरे हाथ में हनुमान चालीसा की छोटी सी किताब. वो बच्चा मंदिर के एक
हिस्से में बैठने के लिए जो तख़्त बना था उसपर कोने में जाकर बैठ गया. और अपनी माँ
की तरफ एक नज़र देखते हुए अपने हाथ में लिए प्रसाद को कोने में फेंक देता है. उसके
आँखों से आंसू अभी भी गिर रहे थे.
अब यहाँ बाल मन के बारे में एक बार सोचते
हैं. अगर उसे पता होता कि उसके दुसरे हाथ में लिये हुए किताब का सम्बन्ध भी उसी भगवान
से है जिसके कारण उसे मार पड़ी, क्या उसे न फेंक देता ? माँ ने उसका बुरा नहीं चाहा
होगा. निश्चित ही उसके सुख की कामना के साथ ही मंदिर गयी होगी. बच्चे को भगवान के
प्रति भक्ति-भाव सिखा रही होगी. लेकिन ये कैसी जड़ता है भगवान और धर्म के प्रति कि
अगर बच्चा भगवान की मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर नहीं खड़ा होगा तो उसे भगवान् का
आशीर्वाद नहीं मिलेगा. लोग ये क्यों नहीं समझते कि धर्म या ईश्वर और कुछ नहीं जीवन
को अनुशासित रखने का तरीका भर है. जिसमें सदाचार, सम्मान, समृद्धि और तमाम दृष्ट-अदृष्ट
सुख निहित है.
मुंबई जैसे महानगरों में ३३० स्क्वायर
फीट से १०००-१२०० स्क्वायर फीट के बीच रहने वाले मिडिल क्लास फैमिली के बच्चो को खेलने
के लिए जगह की कमी है. बहुत कमी है. स्क्वायर
फीट के नंबर कम या ज्यादा हो सकते हैं. लेकिन समस्या कमोवेश एक जैसी ही है. अब एक बार फिर से हम उस बच्चे को उसी फ्रेम में लेते हैं, जहाँ
वो फुर-फुर कर बाहें फैलाये दौड़ रहा है. क्या होता अगर माँ ये समझती, उस बड़े से
खुले जगह ने उसे भागने के लिए अट्रैक्ट किया है, और उसे वैसे ही छोड़ देती ? क्या
होता अगर माँ-बाप स्वयं बैठे होते भगवान् के सामने हाथ जोड़े उसे दौड़ते देख
मुस्कुरा भर देते ? शायद थोड़ी देर में अपनी बाल सुलभ भागा-दौड़ी छोड़ उनके पास आ
बैठता. शायद उन्हें देख, उनकी तरह वो भी ध्यान लगा कर बैठ जाता अपनी आँखें बंद करके. और शायद उन संस्कारों को वो वैसे ही अपनाने की कोशिश करता जैसा की वो उसे देना चाहते हों.
लेकिन इन महानगरों की यही तो कमी है.
यहाँ हर बात की जल्दी होती है. हम ५ साल के बच्चों से १० साल के बच्चों जैसी उम्मीद
करते हैं और १० साल के बच्चों से १५ साल के बच्चों जैसी समझदारी की उम्मीद करते
हैं. हम उसे उनकी उम्र के साथ बड़े होने ही नहीं देते. जिंदगी की जिस रेलमपेल और
धक्कामुक्की में हम हैं बच्चों को भी उसी में धकेलते जाते हैं. जैसे हमने अपनी जिंदगी
के लिए जो मानक बना लिया है तो बना लिया है और उसमें अपने बच्चो को भी फिट करके ही मानेंगे.
इससे उत्पन्न फ्रस्टेशन और
अंतर्विरोधों को बच्चा व्यक्त कैसे करे ? किससे कहे ?
बहुत जरुरी है कि हम अपने बच्चो का मार्गदर्शन
करें. पर उससे ज्यादा जरुरी है स्वयं के अन्दर वो क्षमता लायें जिससे बच्चों की भावनात्मक
जरुरत से लेकर उसकी सामाजिक और बौद्धिक जरुरत को समझ सकें. बच्चों में आत्मसम्मान का
बोध कहीं से भी बड़ों से कम नहीं होता. तो हमें उसका ध्यान भी रखना ही होगा.
उन्मुक्त हवा के नादान परिंदे
बूँद ओस की हैं ये बच्चे,
आओ सीखें बेफिक्री इनसे
सबसे बड़े नेम-धरम ये बच्चे |

बेहतरीन अभिव्यक्ति ! सच ही तो है हम बच्चों को उनकी उम्र के साथ बड़ा नहीं होने देते। अच्छी शुरुआत, सच्ची शुरुआत !����
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